बीजोपचार, रोग एवं कीट प्रबंधन से किसानों को मिलेगा बेहतर उत्पादन, कृषि विशेषज्ञों ने जारी की सलाह
अजमेर, 9 जुलाई। खरीफ सीजन में बाजरा सहित अन्य प्रमुख फसलों का अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसानों को बीजोपचार, मृदा उपचार, संतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा रोग एवं कीट नियंत्रण के वैज्ञानिक उपाय अपनाने चाहिए। कृषि विभाग के विशेषज्ञों ने किसानों से समय पर पौध संरक्षण उपाय अपनाकर फसल को सुरक्षित रखने की अपील की है।
ग्राह्य परीक्षण केन्द्र, तबीजी फार्म के उप निदेशक कृषि (शस्य) श्री मनोज कुमार शर्मा ने बताया कि बाजरा, ज्वार, मक्का, मूंगफली, तिल, ग्वार, मूंग, उड़द, चंवला एवं मोठ खरीफ की प्रमुख फसलें हैं। इन फसलों में अधिक उत्पादन के लिए उन्नत एवं प्रतिरोधी किस्मों का चयन, बीजोपचार, मृदा उपचार, खरपतवार प्रबंधन तथा संतुलित उर्वरक उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बीज एवं मृदा जनित रोगों तथा कीटों की रोकथाम के लिए बीजोपचार सबसे सरल, सस्ता एवं प्रभावी उपाय है। बीजों को कवकनाशी, कीटनाशी एवं जीवाणु कल्चर से निर्धारित क्रम में उपचारित किया जाना चाहिए तथा उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही किया जाना चाहिए। कृषि रसायनों का प्रयोग करते समय मास्क, दस्ताने, चश्मा एवं पूरे शरीर को ढकने वाले वस्त्र पहनना आवश्यक है।
कृषि अनुसंधान अधिकारी (पौध व्याधि) डॉ. जितेन्द्र शर्मा ने बताया कि बाजरा में तुलासिता, हरितबाली, अरगट तथा ब्लास्ट प्रमुख रोग हैं। बुवाई से पूर्व बीजों को मेटालेक्जिल 35 प्रतिशत डब्ल्यूएस की 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। जिन क्षेत्रों में बुवाई हो चुकी है वहां तुलासिता एवं हरितबाली रोग के लक्षण दिखाई देने पर बुवाई के लगभग 21 दिन बाद मैन्कोजेब अथवा मेटालेक्जिल एवं मैन्कोजेब मिश्रित कवकनाशी का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव करें। ब्लास्ट रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर प्रोपीकोनाजोल अथवा ट्राइफ्लोक्सीस्ट्रोबिन एवं टेबुकोनाजोल युक्त कवकनाशी का छिड़काव कर 15 दिन बाद पुनः दोहराएं।
सहायक कृषि अनुसंधान अधिकारी (कीट) डॉ. सुरेश चौधरी ने बताया कि दीमक, सफेद लट, तनामक्खी एवं तना छेदक कीटों से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व बीजों का इमिडाक्लोप्रिड अथवा क्लॉथियानिडिन से उपचार करना चाहिए। जिन क्षेत्रों में फसल खड़ी है वहां कातरा कीट के नियंत्रण के लिए क्यूनालफॉस या क्लोरपायरीफॉस का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव किया जा सकता है। वहीं सफेद लट एवं दीमक के नियंत्रण के लिए क्यूनालफॉस अथवा इमिडाक्लोप्रिड को सूखी मिट्टी या बजरी में मिलाकर पौधों की जड़ों के पास डालने के बाद हल्की सिंचाई करने की सलाह दी गई है। उन्होंने किसानों से मानसून के दौरान कीट प्रकोप पर सतत निगरानी रखते हुए कृषि वैज्ञानिकों की अनुशंसाओं के अनुसार ही पौध संरक्षण उपाय अपनाने का आग्रह किया।