हाथ कांपते है मेरे मैं ब्रह्मलीन नही लिख पाता हूं…

आज 10 जनवरी है… समय चक्र के साथ जिंदगी का मुकाम तेजी से नजदीक आ रहा है !
हमसे विदाई ली आपने ! आसुओं से भरी आंखे सूखी हुई लगती है। पथरा सी गई यह आंखें, कभी -कभी आपका स्मरण होने पर बहुत नम हो जाती है !
कभी जब आप का मेरे सामने होने का अहसास होता है, तो आपकी तस्वीर के पैरों को छूकर आपके होने का अहसास करता हूं , आपकी तस्वीर के सहारे हौसला बढ़ाता हूं !
आप भले ही चले गए.… श्री राम चरणों मे
लेकिन हो ….. आप मेरे साथ ….. ही
जिंदगी के इन मुश्किल दिनों में आपको पूरी तरह महसूस किया !
आपकी कई बातें हौसला बढाती है !
कहीं आपका नाम लिखना होता है तो बह्मलीन नही लिख पाता हूं। हाथ कांपते है, मन गंवारा नहीं करता !
वो किताबे जो आप पढा करते थे, और कहते थे कि इन्हें पढो ! अब आपके जाने के बाद वो सब किताबें मै पढ रहा हूँ !
बहुत कुछ जाना, बहुत कुछ सीखा, वो आपकी प्रिय गुरु जी की लिखी पुस्तक *जीवन एक सफर*। सही में वो किताब नहीं, जीवन के गहरे अर्थों का सार है !
बीते यह 12 दिन याद दिला रहे है आपकी…
आप कहते थे कि जीवन का सार शून्य ही है। अब शून्यता समझ आ रही है !
लग भी रहा है कि जीवन शून्यता की ओर बढ़ रहा है ! बहुत कुछ सिखाया आपने, जीते जी भी और जाने के बाद भी !
अंगुली पकड़ कर चलने से लेकर हौसलों के साथ जीवन में आगे बढने का सारा पथ आपका ही दिया है ! जिंदगी के कई मोडो पर जब मैं अनिर्णय रहा हूँ तो आप ही एक शक्ति के रूप में मुझे संभाले मिले हैं !
आप यूं ही सदा हमारे सम्पूर्ण और अपने धनेश्वर (सर्व संगत) परिवार के साथ बने रहे !

दौलत खेमानी
आप का यह कहना कि प्रभु श्रीराम में ही संपूर्णता है !
आज समझ में आती है !
क्यूं आप सादा जीवन उच्च विचार से जुडे किस्से और कहानियाँ बताया करते थे ! क्यूं आप कहते थे कि जितनी चादर हो, उतने ही पैर पसारने चाहिए।
अब लगता है…. आप जैसा बनने के लिए तो मुझे कई जन्म लेने होंगे।
धन्य है आप !
हर गलती के लिए क्षमा सहित !
आपके उपकारों का ऋणी

-दौलत राम खेमानी

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