अनिल लोढ़ा को इतना जल्दी भूल गया अजमेर?

अनिल लोढ़ा
अजीबोगरीब शहर है अजमेर। बेशक तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा साहब को अपने आचंल में समेटे यह शहर बहुत सुकून देता है। दुनिया में सांप्रदायिक सौहाद्र्र की जीती जागती मिसाल है। यहां जीना वाकई अच्छा लगता है। बहुत…बहुत गौरवपूर्ण इतिहास की चटाई पर पसर कर इठलाता है ये शहर, उससे इंकार भी नहीं। मगर…। लगता है, ये उन्हें भी भुला देता है, जिन्होंने यहां की आब-ओ-हवा में रच-बस कर अपनी खुशबू से इसे महकाया है। पता नहीं, घोर मतलबी हैं यहां के लोग या फिर भूल जाने की बीमारी से ग्रस्त। पता नहीं और शहर भी ऐसे ही हुआ करते होंगे। मगर इसकी धड़कन के साथ धड़कने ने इस अहसास को गहरे पैठा दिया है कि यहां जो भी आया और गया, उसकी कीमत एक यायावर से ज्यादा अदा नहीं की इसने।
अजमेर के ही लाल, जाने-माने पत्रकार श्री अनिल लोढ़ा, जिन्हें अजमेर से बड़ा प्यार है, अजमेर पर बड़ा नाज है, भी कदाचित इसी अहसास से गुजरे होंगे, हाल के अजमेर प्रवास के दौरान। पत्रकारिता की ऊंचाइयां छूने के बाद भी अपनी जड़ों से प्यार में पागल इस शख्स ने हाल ही अपने एवन टीवी चैनल के बैनर पर जवाहर रंगमंच पर कवि सम्मेलन जुटाया तो शहर के चंद लोग ही उसके साक्षी बनने पहुंचे। आप लाख गिनाते रहो इस शहर की सांस्कृतिक विरासत। गुणगान करते रहो कि महाकवि चंद वरदायी इस धरा से वाबस्ता रहे हैं। इठलाते रहो इस शैक्षिक राजधानी पर। पूरे उत्तर भारत में सर्वप्रथम संपूर्ण साक्षर होने का गौरव भी इसे ही हासिल है। मगर जब इसी के सपूत ने कवियों की जाजम बिछाई तो उस पर बैठने को गिने-चुने लोग ही जुटे। नि:संदेह कवि सम्मेलन कामयाब रहा, मगर मंच की ओर से, श्रोताओं की ओर से नहीं। खुद अनिल लोढ़ा के स्वागत भाषण की पहली पंक्तियां भी ये पीड़ा बयां कर रही थीं। समापन पर आभार प्रदर्शन में भी ये दर्द प्रदर्शित हुआ कि अगली बार हर मित्र अपने दो मित्रों को जरूर साथ लाए।
अजमेर में पत्रकारिता के अपने लंबे इतिहास में न जाने कितने मित्र बनाए होंगे उन्होंने। खबर में नाम छाप कर असंख्य लोगों को ऑब्लाइज किया होगा। जयपुर में अजमेर का डंका बजा रहे हैं तो कितने ही लोग अपने निजी काम भी करवा आते हैं। मुझे पता है, अनगिनत कृपा पात्र हैं उनके। मगर जब अपनी माटी का कर्ज उतारने को वे अजमेर आए तो ये सिला मिला इस शख्स को। अजमेर से इतना निराश वे शयद शायद बार हुए होंगे।
प्रसंगवश यह बनाना गैर जरूरी नहीं कि मूर्धन्य पत्रकार श्री अनिल लोढ़ा, जिन्होंने जयपुर जा कर अपनी धूम मचाई, अजमेर के कॉलेज टाइम में बेहतरीन डिबेटर हुआ करते थे। मेरी नजर में अजमेर के वे एक मात्र पत्रकार हैं, जिनकी लेखनी में एक भी शब्द इधर से उधर नहीं किया जा सकता। चाह कर भी नहीं। नवोदित पत्रकारों के लिए वे प्रेरणा स्तम्भ हैं। राजस्थान में अनेक स्थापित पत्रकार उनकी ही देन हैं। वे अजमेर में दैनिक नवज्योति, राजस्थान पत्रिका व नवभारत टाइम्स से जुड़े रहे। जयपुर में भास्कर के आने पर स्टेट कॉआर्डिनेटर रहे। इसके बाद इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश किया और बेहतरीन राजनीतिक विश्लेषक के रूप में स्थापित हो गए। वे सुनहरा राजस्थान नामक खूबसूरत साप्ताहिक के साथ एवन टीवी चैनल का भी संचालन कर रहे हैं।
खैर, फिर मुद्दे पर आते हैं। अकेले अनिल लोढ़ा के साथ ऐसा नहीं बीता। जाने-माने हास्य कवि एवं व्यंग्यकार श्री रासबिहारी गौड़ का अनुभव भी बहुत कड़वा रहा है। वे कितना जमीन-आसमान एक करके देश के दिग्गज साहित्यकारों का संगम करवाते हैं, लिटरेचर फैस्टिवल के नाम पर, मगर कुछ ज्यादा ही पढ़े-लिखे शहर के लोग घर पर आराम करना ज्यादा पसंद करते हैं। किसी जमाने में दैनिक न्याय के संपादक स्वर्गीय विश्वदेव शर्मा की डंका बजता था, मगर अहमदाबाद में उनका देहावसान हुआ तो कितने लोगों ने उन्हें यहां श्रद्धांजलि दी? लंबे अरसे तक राजस्थान पत्रिका के ब्याूरो चीफ रहे स्वर्गीय जे. पी. गुप्ता ने आदर्श पत्रकारिता की मिसाल कायम की, मगर वे कब चल बसे शहर में चर्चा तक नहीं हुई।
चलो, ये सभी तो एक विधा के महारथी रहे, मगर जिन राजनेताओं ने इस शहर की दशा व दिशा में अपनी भागीदारी निभाई है, वे भी इस शहर के मिजाज को चख चुके हैं। भूतपूर्व केबीनेट मंत्री स्वर्गीय श्री किशन मोटवानी ने जीवनदायिनी बीसलपुर परियोजना की आधारशिला रखी, उन तक को यह शहर भूल चुका है। कोई नामलेवा नहीं। चंद भक्त जरूर जयंती व पुण्यतिथि मनाते हैं। आजादी के बाद पहली बार केन्द्रीय मंत्रीमंडल में स्थान पा कर अजमेर का नाम रोशन करने वाले सचिन पायलट ने पहली बार यहां विकास की गंगा बहाई, मगर दूसरे ही चुनाव में बुरी तरह हरा दिए गए। पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह की कितनी कद्र है, किसी से छिपी नहीं। विधायक रहे स्वर्गीय नवलराय बच्चानी इस शहर में आम आदमी बन कर रह गए थे? विधायक हरीश झामनानी को खुद भाजपा वाले कितनी तवज्जो देते है, बताने की जरूरत नहीं। राज्य मंत्री श्रीकिशन सोनगरा को भी गाहे-बगाहे याद किया जाता है। शहर भाजपा अध्यक्ष पूर्णाशंकर दशोरा तो कभी कभी ही याद आते हैं। ऐसे ही अनेक नाम हैं। विशेष रूप से भाजपा में। कांग्रेस वाले तो फिर भी अपने दमखम पर जिंदा हैं। राजनीति में तो फिर भी जमीन-आसमान का फासला सिमटता रहता है, मगर इस शहर में ऐसे कितने ही प्रभावशाली अधिकारी रिटायरमेंट के बाद गुमनामी की जिंदगी गुजार रहे हैं। कुल जमा अपुन को तो ये ही समझ आया कि इस शहर की फितरत है बीती को बिसारने की।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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