सरकारी च्यवनप्राश को डकारने से वंचित हो गए सफेदपोश

एक दिलचस्प बात ये हुई कि जैसे ही भास्कर में च्यवनप्राश के निर्माण पर रोक की खबर लगी तो एक अन्य समाचार ने यह प्रकाशित कर दिया कि आयुर्वेद रसायनशाला में च्यवनप्राश के निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी है। बल्कि इसका निर्माण बदस्तूर जारी है। इस पर सुबह ही तत्कालीन संपादक श्री अनिल लोढा ने श्री कासलीवाल को फोन कर बताया कि आज तो अन्य समाचार पत्र ने आपकी खबर की धुलाई कर दी है। तब उन्होंने संपादक जी से बस इतना कहा कि सर भास्कर कल भी तो छपेगा। चूंकि कासलीवाल ने अपने भरोसेमंद सूत्रों के आधार पर ठोक बजा कर ही खबर बनाई थी इस कारण वे निष्चिंत थे। लेकिन मन में धुकधकि मच गई, उन्हें अपने सोर्स से वो पत्र जो लेना था। उनसे बातचीत हुई और सुबह रसायनशाला खुलते ही वहां पहुँच गए। जहां सोर्स ने उन पर जताए भरोसे को कायम रखते हुए चाय की थड़ी पर ही आदेश की कॉपी थमा दी। तब श्री कासलीवाल भास्कर आफिस में रोजाना सुबह होने वाली मीटिंग में पहुँचे ओर संपादक श्री अनिल लोढ़ा जी को उस आदेश की कॉपी सौपी। अगले दिन ही भास्कर के अंतिम पेज पर आयुर्वेद विभाग के उप शासन सचिव का वह पत्र ही, यह है सच्चाई, शीर्षक से प्रकाशित कर दिया जिसमें आयुर्वेद निदेशक को च्यवनप्राश के निर्माण पर रोक का आदेश दिया गया था। है न खबर के असर का दिलचस्प वाकया। यह भी रोचक बात तब से लेकर आज तक राजकीय आयुर्वेद रसायनशाला में च्यवनप्राश का निर्माण वापस शुरू ही नहीं हो पाया।
श्री कासलीवाल वर्तमान में दैनिक भास्कर अजमेर में ही अजमेर जिले के सेटेलाइट इंचार्ज हैं। उन्होंने इस प्रकार की अनेक स्टोरीज कवर की हैं, जिनके दूरगामी प्रभाव हुए हैं। खबरों के जरिए अनेक ऐसी जानकारियों से उन्होंने जनता को रूबरू करवाया है, जिसके बारे में किसी को पता नहीं लग पाया था। उनमें से एक खबर ये भी थी कि बाल विवाह पर रोक कानून बनाने वाले हरविलास शारदा खुद ही शिकार थे बाल विवाह के।
इसके अतिरिक्त एक बहुत ब्रेकिंग स्टोरी की, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम लोकार्पण समारोह तक में नहीं गए। हुआ यह था जब श्री सुरेश कासलीवाल दैनिक भास्कर के ब्यावर ब्यूरो चीफ थे। तब टाटगढ़ में राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी का वहां पहाड़ी पर स्थित प्रज्ञा शिखर के लोकार्पण समारोह में आने का कार्यक्रम तय हुआ। उनके आने की तैयारियां भी शुरू हो गयी। इस बीच ही श्री सुरेश कासलीवाल ने यह खबर ब्रेक की कि राष्ट्रपति जहां लोकार्पण करने वाले हैं वहा जमीन ही विवादित है और कोर्ट में केस विचाराधीन है, ऐसे में राष्ट्रपति के हाथों लोकार्पण पर ही सवाल खड़े हुए। खबर की गूंज इतनी बड़ी थी कि सुरक्षा एजेंसियों के जरिये राष्ट्रपति भवन तक जा पहुचीं। विवाद से जुड़े कागजात भी तलब कर लिए गए। प्रशासन के भी हाथ पैर फूल गए। खबर का इतना जबरदस्त असर हुआ कि राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम तय दिन टाटगढ़ तो आये लेकिन पहाड़ी पर स्थित प्रज्ञा शिखर के लोकार्पण कार्यक्रम में नहीं गए बल्कि नीचे ही छोटे छोटे बच्चों से मिल कर ही वापस चले गए।
वस्तुतः कासलीवाल जी की दैनिक न्याय अखबार के समय से ही मुझसे काफी नजदीकी रही है। इसी कारण उनकी पत्रकारिता की यात्रा के बारे में मेरी गहन जानकारी है। इस कारण मैं पूरी जिम्मदारी व यकीन के साथ कह सकता हूं कि
श्री कासलीवाल अजमेर के उन चंद पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पत्रकारिता महज नौकरी के लिए नहीं की, बल्कि पूरे जुनून के साथ गहरे में डूब कर की। ऐसे ही जुनूनियों के लिए कहा गया है कि जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ।