एक मंजर मेरी आँखों के सामने से गुजर गया

त्रिवेन्द्र पाठक
एक मंजर मेरी आँखों के सामने से गुजर गया,
कल रात आँधियों ने चाँद को धुंधला कर दिया..

वो चाँद जिसको देखकर आहें भरते है लोग,
उनकी रात को आँधियों ने रुसवा कर दिया…

जिन्दगी है तो आएगी आंधियां भी अक्सर
पर क्या किसी ने किसी को भुला दिया…

जो कल धुंधला सा था आज वो उजला भी होगा,
कौनसा उसने चाँद को शर्मसार कर दिया…

यूँ तो ग्रहण भी छुपा लेता है सूरज को,
तो क्या सूरज ने निकलना छोड़ दिया…..

और अक्सर आ जाते है समंदर में तूफान
तो क्या जहाजो ने आना जाना छोड़ दिया…

और उम्मीद है तो होगी मुकम्मल मुह्हबत.
क्या उसके कहने से “पाठक” ने उसे छोड़ दिया…

त्रिवेन्द्र कुमार “पाठक”

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