मंजिल मिलते ही उसे , खाक मान लेते हैं

मंजिल मिलते ही उसे ,
खाक मान लेते हैं ,
फिर नई मंजिल की हम
ताक छान लेते हैं।

पूर्ण हो जायेंगे ,
भौतिक चीजों से कभी,
इस असत्य को भी हम ,
सत्य मान लेते हैं ।

दौड़ते रहते है रूकते नही
हम कभी ,
रुक जाए कोई तो
उसे पाप मान लेते है,
पूर्ण हो गया होगा वो
अपने आप में,
इस सत्य को भी ,
असत्य मान लेते हैं।

प्रदीप देवानी

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