सामाजिक सुरक्षा का कवच और समावेशी विकास का उजाला

किसी राष्ट्र की प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन केवल उसकी आर्थिक विकास दर, विशाल औद्योगिक परियोजनाओं, आधुनिक तकनीक, विदेशी निवेश और ऊंची प्रति व्यक्ति आय से नहीं किया जा सकता। विकास की सार्थकता तब सिद्ध होती है, जब समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी जीवन की अनिश्चितताओं से सुरक्षा मिले, श्रमिक को अपने भविष्य के प्रति विश्वास हो, वृद्धावस्था अभाव का पर्याय न बने और बीमारी किसी परिवार को आर्थिक संकट के गर्त में न धकेल दे। सामाजिक सुरक्षा इसी मानवीय विकास का आधार है। यह केवल सरकारी सहायता की व्यवस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के सम्मान, आत्मविश्वास, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक न्याय का ऐसा आधारस्तंभ है, जिस पर एक सशक्त एवं समावेशी राष्ट्र का निर्माण होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पिछले वर्षों में जनकल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा को व्यापक बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। इन पहलों ने करोड़ों लोगों को विभिन्न प्रकार की आर्थिक, स्वास्थ्य, खाद्य और सामाजिक सहायता से जोड़ने में भूमिका निभाई है। हालांकि, बदलती आर्थिक परिस्थितियों और विशाल श्रमबल की आवश्यकताओं को देखते हुए अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना शेष है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायरा वर्ष 2015 के 19 प्रतिशत से बढ़कर 64.3 प्रतिशत यानी 94 करोड़ से अधिक नागरिकों तक पहुंच गया है। यह विस्तार बताता है कि सामाजिक संरक्षण अब देश की विकास संबंधी प्राथमिकताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा की सफलता का आकलन केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं होना चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि कितने लोगों को आवश्यकता के समय पर्याप्त सहायता मिलती है, कितने परिवार बीमारी और बेरोजगारी के संकट से उबर पाते हैं तथा कितने श्रमिक बुढ़ापे में सम्मानपूर्वक जीवन जीने की स्थिति में हैं। योजनाओं की व्यापकता के साथ उनकी पर्याप्तता, गुणवत्ता और निरंतरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सामाजिक सुरक्षा का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यहां श्रमबल का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है। उपलब्ध श्रम संबंधी आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल श्रमबल में लगभग 87 प्रतिशत हिस्सेदारी असंगठित क्षेत्र की है। खेतों में काम करने वाले किसान-मजदूर, निर्माण श्रमिक, घरेलू कामगार, रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे दुकानदार, दैनिक वेतनभोगी और विभिन्न सेवाओं से जुड़े कामगार देश की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। लेकिन इनमें से बड़ी संख्या के पास नियमित वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और दुर्घटना सुरक्षा जैसी सुविधाएं नहीं हैं। रोजगार मिलने और छिनने के बीच उनका जीवन अक्सर अनिश्चितता से घिरा रहता है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा को केवल संगठित क्षेत्र तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। इसकी पहुंच उन हाथों तक भी सुनिश्चित करनी होगी, जो देश की उत्पादन व्यवस्था और सेवा अर्थव्यवस्था को अपने श्रम से संचालित करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जनधन खातों, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आधार आधारित पहचान और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से सरकारी सहायता को लाभार्थियों तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक व्यवस्था विकसित की है। प्रधानमंत्री जनधन योजना ने बैंकिंग सुविधाओं से वंचित लोगों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने में योगदान दिया है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने अनेक योजनाओं में बिचौलियों की भूमिका कम करने और सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के खातों तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इन व्यवस्थाओं ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन को अधिक पारदर्शी बनाने की संभावनाएं मजबूत की हैं।
स्वास्थ्य सुरक्षा सामाजिक संरक्षण का सबसे संवेदनशील पक्ष है। आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ने पात्र परिवारों को अस्पताल में भर्ती होकर उपचार कराने के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को आयुष्मान वय वंदना योजना के माध्यम से स्वास्थ्य कवरेज के दायरे में लाने की पहल ने वृद्धावस्था में चिकित्सा संबंधी चिंताओं को कम करने का प्रयास किया है। फिर भी सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यय बढ़ाने, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सशक्त बनाने, ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और दवाओं तथा जांच की लागत कम करने की आवश्यकता बनी हुई है। गंभीर बीमारी के कारण किसी परिवार की वर्षों की बचत समाप्त हो जाना या उसे कर्ज लेने के लिए विवश होना सामाजिक सुरक्षा की अपूर्णता को उजागर करता है। स्वास्थ्य सुविधाएं तभी प्रभावी सुरक्षा कवच बनेंगी, जब उपचार की उपलब्धता के साथ उसकी वहनीयता भी सुनिश्चित होगी।
आर्थिक सुरक्षा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, अटल पेंशन योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी पहलें अलग-अलग वर्गों की आवश्यकताओं को संबोधित करती हैं। पीएम-किसान के माध्यम से पात्र किसान परिवारों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता मिलती है। अटल पेंशन योजना असंगठित क्षेत्र के लोगों को वृद्धावस्था में नियमित आय की व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास करती है। जीवन ज्योति बीमा और सुरक्षा बीमा योजनाएं क्रमशः जीवन बीमा तथा दुर्घटना बीमा के माध्यम से परिवारों को संभावित आर्थिक संकट से बचाने में सहायक हैं। प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना, जिसे पीएम-पोषण के नाम से जाना जाता है, विद्यालयों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के माध्यम से पोषण और शिक्षा से जुड़े सामाजिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाती है।
श्रमिकों की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) का दायरा बढ़ाने संबंधी कदम भी महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, 17 सितंबर 2026 से अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा के लिए मासिक वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये किए जाने का प्रावधान है। यदि इसका क्रियान्वयन निर्धारित स्वरूप में होता है, तो लगभग 51 लाख अतिरिक्त कर्मचारी अनिवार्य भविष्य निधि व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं। यह बदलाव उन कर्मचारियों के लिए विशेष महत्व रखता है, जिनका वेतन बढ़ने के कारण वे पुरानी सीमा के बाहर रह जाते थे। भविष्य निधि में नियमित अंशदान से सेवानिवृत्ति के लिए बचत का आधार तैयार होता है, जबकि लागू प्रावधानों के अनुसार पेंशन और बीमा संबंधी सुविधाएं भी परिवार को आर्थिक सहारा प्रदान कर सकती हैं। हालांकि, इस विस्तार के साथ कर्मचारियों की वर्तमान हाथ में आने वाली आय, नियोक्ताओं की लागत और छोटे उद्यमों की वित्तीय क्षमता के बीच संतुलन बनाना भी आवश्यक होगा।
सामाजिक सुरक्षा के विस्तार में ई-श्रम पोर्टल एक महत्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरा है। बदलती अर्थव्यवस्था ने सामाजिक सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में काम करने वाले डिलीवरी कर्मियों, कैब चालकों तथा अन्य सेवा प्रदाताओं को रोजगार के अवसर तो मिलते हैं, लेकिन उनकी आय, कार्य-अवधि और भविष्य की सुरक्षा अक्सर अनिश्चित रहती है। इसी प्रकार महिलाओं, प्रवासी श्रमिकों, दिव्यांगों और वृद्ध नागरिकों की जरूरतें एक जैसी नहीं हैं। महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ और सुरक्षित कार्यस्थल, प्रवासी श्रमिकों के लिए राज्य की सीमाओं से परे भी उपलब्ध रहने वाली सुविधाएं तथा निर्माण श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाओं तक सरल पहुंच सुनिश्चित करना आवश्यक है। सामाजिक सुरक्षा का ऐसा लचीला मॉडल विकसित होना चाहिए, जिसमें व्यक्ति के नियोक्ता, कार्यस्थल अथवा निवास स्थान बदलने पर भी उसके अधिकार बाधित न हों।
इसके साथ ही वृद्धावस्था और विधवा पेंशन की राशि को महंगाई के अनुरूप अधिक पर्याप्त बनाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय बढ़ाने और असंगठित श्रमिकों के लिए योगदान आधारित पेंशन तथा बीमा विकल्पों को सरल एवं सुलभ बनाने पर विशेष ध्यान देना होगा। पंचायतों, नगर निकायों और साझा सेवा केंद्रों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के प्रसार तथा पंजीकरण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। विकसित भारत का स्वप्न तभी साकार होगा, जब आर्थिक विकास के साथ सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा भी समान गति से आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सामाजिक सुरक्षा का विस्तृत होता दायरा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन को रेखांकित करता है। लेकिन अगला चरण केवल योजनाओं के विस्तार का नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और अंतिम व्यक्ति तक वास्तविक लाभ पहुंचाने का होना चाहिए। सामाजिक सुरक्षा पर होने वाला व्यय सरकारी खजाने पर बोझ नहीं, बल्कि स्वस्थ, उत्पादक और आत्मविश्वासी समाज के निर्माण में निवेश है। जब श्रमिक को भविष्य की चिंता से राहत मिलेगी, किसान को संकट में सहारा मिलेगा, वृद्ध को सम्मानपूर्ण जीवन और गरीब परिवार को बीमारी के समय उपचार का भरोसा मिलेगा, तभी विकास की उपलब्धियां जनजीवन में सार्थक परिवर्तन ला सकेंगी। यही समावेशी विकास की वास्तविक कसौटी और एक सशक्त, संवेदनशील तथा आत्मनिर्भर भारत की आधारभूमि है।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

Leave a Comment

This site is protected by reCAPTCHA and the Google Privacy Policy and Terms of Service apply.

error: Content is protected !!