देवी-देवताओं के वाहन पशु-पक्षी

देवी और देवता 33 प्रकार के होते हैं। प्रत्येक देवी और देवता का एक वाहन होता है। देवी-देवताओं ने अपने वाहन के रूप में कुछ पशु या पक्षियों को चुना है, तो इसके पीछे उनकी विशिष्ठ योग्यता ही रही है। अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को जोड़ा है। यह भी माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है। अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है, इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।
ग्रंथों के अनुसार विष्णु का वाहन गरुड़ है। माना जाता है कि गिद्धों (गरुड़) की एक ऐसी प्रजाति थी, जो बुद्धिमान मानी जाती थी और उसका काम संदेश को इधर से उधर ले जाना होता था, जैसे कि प्राचीनकाल से कबूतर भी यह कार्य करते आए हैं। प्रजापति कश्यप की पत्नी विनता के 2 पुत्र हुए- गरुड़ और अरुण। गरुड़जी विष्णु की शरण में चले गए और अरुणजी सूर्य के सारथी हुए। सम्पाती और जटायु इन्हीं अरुण के पुत्र थे।
मां लक्ष्मी का वाहन उल्लू है। पश्चिमी मान्यता अनुसार किस व्यक्ति को मूर्ख बनाना अर्थात उल्लू बनाना कहा जाता है। इसका यह मतलब कि मूर्ख व्यक्ति को उल्लू समझा जाता है, लेकिन यह धारणा गलत है। उल्लू सबसे बुद्धिमान निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। उल्लू को भारतीय संस्कृति में शुभता और धन संपत्ति का प्रतीक माना जाता है।
मां सरस्वती का वाहन हंस है। हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। इसकी खासियत हैं कि यह अन्य पक्षियों की अपेक्षा सबसे ऊंचाई पर उड़ान भरता है और लंबी दूरी तय करने में सक्षम होता है। जो ज्ञानी होते हैं वे हंस के समान ही होते हैं और जो बुद्धत्व प्राप्त कर लेते हैं, उनको परमहंस कहा गया है। मां सरस्वती का हंस पर विराजमान होना यह बताता है कि ज्ञान से ही जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है। ज्ञान से ही जीवन में पवित्रता, नैतिकता, प्रेम और सामाजिकता का विकास होता है।
शिव का वाहन नंदी बैल है। शिव के एक गण का नाम है नंदी। प्राचीनकालीन किताब कामशास्त्र, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में से कामशास्त्र के रचनाकार नंदी ही थे। विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में बैल को महत्व दिया गया है। जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं, जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है। मां पार्वती का वाहन बाघ है, तो मां दुर्गा का वहन शेर। माता दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है।
स्कंद पुराण के तमिल संस्करण कांडा पुराणम में उल्लेख है कि देवासुर संग्राम में भगवान शिव के पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) ने दानव तारक और उसके दो भाइयों सिंहामुखम एवं सुरापदम्न को पराजित किया था। अपनी पराजय पर सिंहामुखम माफी मांगी तो मुरुगन ने उसे एक शेर में बदल दिया और अपना माता दुर्गा के वाहन के रूप में सेवा करने का आदेश दिया।
यमराज का वाहन भैंसा है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। अतः यमराज उसको अपने वाहन के तौर पर प्रयोग करते हैं।
देवी गंगा का वाहन मगरमच्छ है। सिंधु, गंगा, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, कावेरी आदि नदियों में जल में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी मगरमच्छ ही है।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि शनिदेव की सवारी कौवा या गिद्ध ही नहीं बल्कि पूरे 9 सवारी शनिदेव की है। जैसे- गिद्ध, घोड़ा, गधा, कुत्ता, शेर, सियार, हाथी, मोर और हिरण हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शनिदेव जिस वाहन पर सवार होकर जिसके पास भी जाते हैं, वह व्यक्ति उसी के हिसाब से फल का उत्तरदायी होता है। हालांकि कौवे को उनकी मुख्य सवारी माना जाता है।
भगवान भैरव का वाहन कुत्ता माना जाता है। हालांकि भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया, लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं। मान्यता है कि कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। हनुमानजी पिशाच को अपना आसन बनाकर उस पर बैठते हैं।
गणेष जी का वाहन मूषक अर्थात चूहा है। इसकी विशेषता है कि वह हर चीज को कुतर डालता है। वह यह नहीं देखता की वस्तु आवश्यक है या अनावश्यक। इसी प्रकार कुतर्की भी यह विचार नहीं करते की यह कार्य शुभ है या अशुभ। श्रीगणेश बुद्धि एवं ज्ञान के देवता हैं तथा कुतर्क मूषक है, जिसे गणेशजी ने अपने नीचे दबा कर अपनी सवारी बना रखा है। कार्तिकेय का वाहन मयूर है। इंद्र ने अपना वाहन ऐरावत नामक एक हाथी को बनाया। समुद्र मंथन के दोरान 14 रत्नों में से एक ऐरावत की भी उत्पत्ति हुई थी। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है।

 

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