सत्ता और संगठन के सेतु के तौर पर काम कर रहे हैं चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा

*राजनीति में कड़े संघर्ष और कुशल नेतृत्व के बाद किया बड़ा मुकाम हाँसिल*
*काबीना मंत्री पिता के साथ पुत्र सागर शर्मा भी कंधे से कंधा मिलाकर जुटे जनसेवा में*

*जयपुर।* छात्र राजनीति से राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले रघु शर्मा ने अपने जीवन तमाम उतार चढ़ाव से पार पाकर सत्ता और संगठन में अपना अलग मुकाम हाँसिल किया है। तमाम असफलताओं के बावजूद उन्होंने कभी हालात से हार नहीं मानी। आज उसी की बदौलत वे सत्ता के शिखर पर है। इतना ही नहीं मौजूदा सरकार में वे अव्वल दर्जे के मंत्री ही नहीं। बल्कि सत्ता और संगठन का सेतू बनकर बेहतरीन तालमेल बैठाने के पारंगत राजनेता के तौर पर अपनी छवि बना चुके हैं।
इसकी ताज़ा तासीर है कि सचिवालय में तमाम मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद उनसे मिलने के लिए प्रदेशभर के नेता और जनता फरियाद लेकर उनके पास पहुंचते हैं। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच समय निकालकर वे लोगों के लिए समय निकालकर उनकी समस्याएं सुनते हैं। आमजन की समस्याओं के निस्तारण का हर सम्भव प्रयास करते हैं। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे अब सरकार में तीसरे स्तम्भ के तौर पर काम कर रहे हैं।
तकरीबन चार दशक पहले सावर जैसे छोटे से गांव से निकलकर पढ़ने के लिए प्रदेश की राजधानी जयपुर पहुंचे शर्मा ने शिक्षा जगत की तमाम डिग्रियां लेने के बाद राजनीति को चुनकर जनसेवा को ही अपना मकसद बनाया। छात्र राजनीति से कैरियर की शुरुआत की। जेल में रहते हुए छात्रसंघ चुनाव जीतकर उभरकर सामने आए। इस सफलता ने उन्हें संगठन में काम करने का मौका दिया। युवक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने प्रदेशभर में अपने साथियों की मजबूत टीम खड़ी कर खुद को राजनीति में स्थापित किया। उनकी काबिलियत और हैसियत देखते हुए पार्टी ने उन्हें भिनाय सीट से विधानसभा भेजने का मानस बनाया। लेकिन वे चुनाव जीत नहीं सके। पार्टी के प्रति वफादारी और अनुशासन के चलते उन्हें लगातार मौके दिए गए।
एक के बाद एक चुनाव हारने के बावजूद पार्टी ने अवसरों में कोई कसर नहीं रखी। चाहे विधानसभा हो चाहे लोकसभा। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। फिर भी शर्मा ने न हार मानी और न ही हताश हुए। नतीजन पार्टी आलाकमान के उनकी नजदीकियां लगातार बढ़ती गई। उनकी राजनीतिक समझ ऐसी थी कि वे न केवल पार्टी के सच्चे सिपाही बने बल्कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नजदीकी सलाहकारों में शुमार हो गए। एक दौर था जब प्रदेश की सियासत की नीतियां तय करने में सत्ता में न होते हुए भी रघु शर्मा का पूरा दख़ल होता था। या यूं कह लीजिए वे सरकार के कर्ता धर्ता थे। 2003 में परिसीमन में उनके गृह क्षेत्र केकड़ी सीट सामान्य हुई। एक बार फिर पार्टी ने उन पर भरोसा जताकर उन्हें प्रत्याशी बनाया। इस बार किस्मत ने उनका साथ दिया। केकड़ी क्षेत्र की जनता ने उनमें आस्था दिखाते हुए सिरमौर बनाया। लेकिन राजनीतिक रूप से परिपक्व यह कद्दावर नेता पार्टी की धड़ेबाजी का शिकार हो गए। विधायक बनने के बावजूद वे मंत्रिपद से वंचित रह गए। बावजूद इसके उनका जुनून और जज़्बा कमज़ोर नहीं हुआ। उन्होंने अवसर को भांपते हुए इलाके के विकास की ठान ली। इसी बीच सरकार ने उन्हें मुख्य सचेतक के पद से नवाजा। सरकार में बड़ा कद और रसूख रखने वाले शर्मा ने अपने प्रभाव से न केवल जमकर इलाके का विकास कराया। बल्कि केकड़ी क्षेत्र को तीन साल के कार्यकाल में ही जिला बनाने की कतार में खड़ा कर दिया। बकौल शर्मा केकड़ी को जिला बनाना उनका विज़न था। उसके लिए वे सिलसिलेवार प्रयास कर रहे थे। इसके लिए तमाम सुविधाएं उन्होंने इलाके को मुहैया भी कराई। सरकार केकड़ी को जिला घोषित करती। इससे पहले सत्ता परिवर्तन हो गई। वे खुद भी इस इलाके से चुनाव हार गए। मिथक रहा कि वे गुस्सैल स्वभाव के खांटी राजनेता थे। इसलिए हारे। लेकिन हार की असल वजह सत्ता विरोधी और मोदी लहर थी। हार के बावजूद शर्मा इलाके से दूर नहीं हुए। वक्त के साथ उन्होंने अपने व्यवहार में भी परिवर्तन किया। अब वे लोगों के दुख दर्द में बराबर के भागीदार बनें। हर उम्र के कार्यकर्ता से अपने संबंध मजबूत किए। इसी दौरान उनके बेटे सागर शर्मा भी राजनीति में पिता के सहभागी हो गए। पिता पुत्र ने जनहित के लिए इलाके में कंधे से कंधा मिलाकर हिस्सा लिया। इस बीच अजमेर सांसद प्रो. सांवर लाल जाट के निधन के बाद उपचुनाव सिर पर आ गए।
पार्टी ने एक बार फिर डॉ. रघु शर्मा की ओर उम्मीद भरी निगाह डाली। असल मे पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट मुख्यमंत्री की दौड़ में थे। वे चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं थे। उन्होंने रघु शर्मा को इस भरोसे के साथ चुनाव में उतारा कि न केवल वे उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रचार करेंगे। बल्कि केकड़ी विधानसभा से टिकट देकर क्षेत्र की सेवा का पूरा मौका भी देंगे। लोकसभा उपचुनाव में शर्मा ने विपरीत माहौल में भारी मतों से जीत दर्ज कराकर कांग्रेस पार्टी का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। शर्मा उत्तर भारत के चुनिंदा सांसदों में से एक थे। जो विपरीत हवा में जीतकर संसद पहुंचे थे। लिहाज़ा जल्दी ही वे उन सांसदों में शुमार हो गए। जो जमीनी स्तर पर वोटों पर पकड़ तो रखते ही थे। साथ ही सदन में क्षेत्र के मुद्दों को उठाकर जनता की आवाज़ बुलंद करते थे। नतीजन वे कम समय में विपक्ष और पार्टी आलाकमान की आंखों का तारा बन गए। जब राजस्थान विधानसभा चुनाव का मौका आया तो पार्टी ने शर्मा को मनचाहा केकड़ी सीट से टिकट दिया। जननेता के तौर पर छवि कायम कर चुके शर्मा एक बार फिर भारी मतों से जीते।आलाकमान ने खुशी जाहिर करते हुए मंत्रिमंडल में काबीना मंत्री का दर्जा देते हुए चिकित्सा एवं स्वास्थ्य और सूचना जनसंपंर्क जैसे अहम पद से नवाजा। अपनी कार्यशैली और व्यवहारकुशलता के चलते उन्होंने प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पार्टी प्रदेशाध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच बेहतरीन सामंजस्य और तालमेल स्थापित किया। इसी का परिणाम रहा कि सरकार में आज वे तीसरे नंबर के अव्वल नेता ही नहीं बल्कि सरकार के तीसरे स्तम्भ के तौर पर काम कर रहे हैं। उनके चहेते और पुराने सहयोगी कहते हैं ‘इतने कड़े संघर्ष के बावजूद भी नेताजी ने कभी हार नहीं मानी और न ही हिम्मत हारे। यह उसी का ही नतीजा है कि वे आज इतने बड़े पद पर हैं। उन्हें जो भी दायित्व मिलता है उस पर पूरा होमवर्क कर बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है’

कमलेश केशोट
चिकित्सा मंत्री डॉ. रघु शर्मा के कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव के टिकट वितरण में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। फिलहाल संगठन के कामकाज के अलावा वे दोनों मंत्रालयों के कामकाज में भी बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। शर्मा का कहना है कि ‘क्षेत्र के विकास के साथ ही स्वस्थ और स्वच्छ प्रदेश उनका सपना है। इसके लिए वे लगातार प्रयासरत है। प्रदेशवासियों को चिकित्सा सेवाओं और सुविधाओं में किसी तरह की तकलीफ न हो यही मेरा लक्ष्य है।’ अपने मंत्री पिता डॉ. रघु शर्मा की गैर मौजूदगी में पुत्र सागर शर्मा केकड़ी क्षेत्र में नियमित रूप से जनहित के कामों के लिए पूरी तरह से लगातार सक्रिय और समर्पित हैं।

कमलेश केशोट

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